के डी जाधव की प्रेरणादायक जीवनी | ओलंपिक में स्वतंत्र भारत को पहला वैयक्तिक पदक दिलाने वाले पॉकेट डायनमो

खाशाबा जाधव की प्रेरणादायक कहानी, K.D motivational story in hindi
के डी जाधव की प्रेरणादायक कहानी

Motivational story in hindi : विश्व का हर शख्स ये चाहता है कि, वह जीवन में सफल हो सके, जिसके लिए वो अथक प्रयास भी करता है। कई बार कुछ अलग करने की चाह और प्रबल प्रेरणा से व्यक्ति अपने मंजिल के करीब पहुँच भी जाता है, लेकिन कुछ कठिन चुनौतियों से हार मान लेता हैं और सफलता से वंचित रह जाता है। लेकिन सफल लोग सफलता के रास्ते में आने वाली हर चुनौतियों को स्वीकार करते हैं, और समाधान निकाल कर अपनी मंजिल की ओर अग्रसर होते हैं।



आज तक दुनिया में बहुत सारे ऐसे शख्सियत हुए हैं, जिन्होंने सफलता के रास्ते में आई हर समस्या का हल निकाल कर कामयाबी नाम के शिखर पर चढ़ें है। और उन सबकी सफलता की कहानी हम सब के लिए प्रेरणादायक हैं। ऐसे ही हर कठिन समस्याओं को मात देकर ओलंपिक में भारत को पहला वैयक्तिक पदक दिलाने वाले खाशाबा जाधव का जीवन भी हरेक के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। खाशाबा जाधव ने ओलंपिक पदक जीतने तक आई उन सब समस्याओं को चुनौती के रूप में स्वीकार कर के कामयाबी हासिल की थी। और ओलंपिक में नया इतिहास रच दिया था। आज ओलंपिक में भारत को पहला वैयक्तिक पदक दिलाने का श्रेय उन्हीं को दिया जाता हैं।



खाशाबा जाधव ने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में बैंटमवेट डिवीजन में कांस्य पदक जीता था।



आज, खाशाबा जाधव भारतीय खेलों में एक चलने वाली किंवदंती है, लेकिन उन्होंने मेडल कैसे जीता इसकी कहानी बेहद ही रोमांचक है।


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खाशाबा जाधव का जन्म


खशाबा जाधव का जन्म 19 जनवरी 1926 में महाराष्ट्र के सतारा जिले के गोलेश्वर गांव में हुआ था। खाशाबा, दादासाहेब के सबसे छोटे बेटे थे।

5 साल की उम्र से ही सीखी पहलवानी


जाधव को पहलवानी का हुनर पैदाइशी मिला था. उनके पिता दादासाहेब खुद भी एक पहलवान थे। और वो जाधव को 5 साल की उम्र से ही पहलवानी के पाठ पढ़ा रहे थे। जिस कारण कुश्ती तो जाधव के रगों में दौड़ती थी। बचपन से ही कुश्ती में उठापटक दांवपेच सीखने वाले खाशाबा जाधव ने महज 8 साल की उम्र में ही अपने इलाके के सबसे धाकड़ पहलवान को सिर्फ 2 मिनट में ही धूल चटा दी थी। 


जाधव ने अपनी पढ़ाई 1940-1947 के बीच कराड के तिलक हाई स्कूल और राजाराम कॉलेज से पूरी की और अपना शेष जीवन कुश्ती के लिए समर्पित कर दिया।


छोटे कद के जाधव ऊपर से देखने में बेहद ही कमजोर दिखाई देते थे। इस कारण राजाराम कॉलेज के प्राचार्य ने उन्हें अपनी कुश्ती टीम में शामिल करने से इनकार कर दिया था। लेकिन बड़े मिन्नतों के बाद जाधव को मौका दिया गया। और उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया। खाशाबा के लाजवाब खेल के कारण सभी उन्हें 'पॉकेट डायनमो' कहने लगे थे।

भारत छोड़ो आंदोलन में लिया हिस्सा


जाधव ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में एक छात्र के रूप में भाग लिया था। उसके बाद जब देश आजाद हुआ और हर ओर तिरंगा लहरा रहा था, तब जाधव के अंदर का पहलवान फिर जाग गया। और उन्होंने तय किया कि, विश्व की सबसे बड़ी प्रतियोगिता यानी ओलंपिक में तिरंगा लहराऊंगा। और वह तैयारी में लग गए।


1948 के लंदन ओलंपिक में लिया हिस्सा


देश की आजादी के बाद पहले ओलंपिक खेलों का आयोजन लंदन में हो रहा है, इसकी भनक जाधव को लगी। लंदन ओलंपिक की जानकारी मिलते ही जाधव ने ठान लिया कि, अंग्रेजों के धरती पर पदक जीतकर तिरंगा लहराऊंगा। और वह मेहनत करने लग गए। 1948 में लंदन ओलंपिक के लिए खाशाबा को फ्लाईवेट डिवीजन के लिए चुना गया था।


लेकिन लंदन जाकर अंग्रेजों की धरती पर तिरंगा लहराने का जाधव का सपना टूट रहा था, क्योंकि जाधव के पास इतने पैसे नहीं थे कि, वह लंदन जा सके। उस समय ओलंपिक में जाने के लिए सरकार पैसा नहीं देती थी, खिलाड़ियों को खुद ही अपने जाने का इंतजाम करना पड़ता था।


लेकिन स्थानीय स्तर पर कुश्ती में उनकी कामयाबी, कुश्ती खेलने का जुनून और लंदन जाकर पदक जीतने के उनके आत्मविश्वास को देखते हुए कोल्हापुर के महाराजा मदद के लिए आगे आए और उनके लंदन जाने का सारा खर्च उठाया। लंदन ओलंपिक में जाधव छठे नंबर पर रहे थे। और वह इस नंबर तक पहुंचने वाले एकमात्र भारतीय खिलाड़ी थे। लंदन ओलंपिक में जाधव का प्रदर्शन ठीकठाक रहा, लेकिन विशेषज्ञों की ओर से उनके खेल को बेहद सराहना मिली थी। उनके देसी मगर फुर्तीले दांवपेच देखकर अमेरिका के पूर्व कुश्ती विश्व चैंपियन रईस गार्डनर काफी इंप्रेस हुए, और उन्होंने जाधव को कोचिंग भी दी।

लंदन में मेडल जीतने का और तिरंगा लहराने का जाधव का सपना भले ही टूट गया हो, मगर अगले ओलंपिक में मेडल के लिए अपनी दावेदारी जरूर ठोक कर आए थे।


हेलसिंकी ओलंपिक 1952



लंदन ओलंपिक में हार मिलने से खाशाबा थोड़े टूूट से 
गए थे, लेकिन उनके उठापटक दावपेंचों ने बहुतों का दिल जीत लिया था। लंदन में हार मिलने के बावजूद मिली तारीफ ने जाधव का हौसला बढ़ाया और उन्होंने वापस लौटते ही 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक खेलों की तैयारी शुरू कर दी. उन्होंने हर तरफ अपनी मेहनत और लगन से जीत हासिल करते हुए नाम कमाया। और हेलसिंकी ओलंपिक के लिए अपनी दावेदारी पक्की की।

हेलसिंकी ओलंपिक के प्रतिभागियों में नहीं था नाम


चयनकर्ताओं ने तो उनकी नैया डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. ओलंपिक की लिस्ट से उनका नाम तक कट गया था. उन्हें बताया गया कि ओलंपिक कार्यकारिणी की सद्भावना के कारण आपको अगले 1952 के ओलंपिक के लिए नहीं चुना जा सकता है। लेकिन जाधव ने हार नहीं मानी। जाधव को लगता था कि, मद्रास में राष्ट्रीय चयन प्रक्रिया में उन्हें जानबूझकर एक अंक कम दिया गया था और इसलिए उन्हें ओलंपिक के लिए नहीं चुना गया।


पटियाला के महाराजा से लगाई न्याय की गुहार


वह इस समय चुप नहीं रहे, बल्कि पटियाला के महाराजा से इंसान की गुहार लगाई। महाराजा खुद खेलकूद के शौकीन थे. ऐसे में जुगाड़ लग गया और जाधव को ट्रायल में हिस्सा लेने के लिए बुलाया गया। जाधव जानते थे कि, मिले मौके को कैसे भी भुनाना पड़ेगा, नहीं तो अभी नहीं तो कभी नहीं। ट्रायल में जाधव ने ओलंपिक के लिए चयनित पहलवान को चंद मिनटों में धूल चटा दी और अपनी ओलंपिक टिकट पक्की कर ली।


हेलसिंकी जाने के लिए पैसों की किल्लत


हेलसिंकी ओलंपिक का तीकट तो जाधव ने पक्का कर लिया, लेकिन लंदन वाली समस्या इस बार भी जाधव को सताने लगी। हेलसिंकी जाने का मतलब था पैसा! जाधव के परिवार के पास इतना पैसा नहीं था, लेकिन जाधव के साथ साथ उनके घरवालों ने भी हार नहीं मानी। लेकिन इस बार पैसों के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी। उनके परिजनों और दोस्तों ने गांव में हर घर का दरवाजा खटखटाया और पैसों का इंतजाम किया। गांववाले भी मदद करने से पीछे नहीं हटे। लेकिन फिर भी पैसे कम पड़ने लगे।


जाधव के परिवार वालों ने मुंबई के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई से मदद की गुहार लगाई, लेकिन वहां से 4000 की मदद मिली, मगर वो काफी नहीं थीं। उस समय खशाबा जाधव राजाराम कॉलेज, कोल्हापुर में पढ़ते थे। कॉलेज के प्राचार्य बैरिस्टर बालासाहेब खरडेकर इस बात से खुश थे कि, उनका छात्र ओलंपिक में जा रहा है और उन्होंने अपना घर कोल्हापुर के मराठा बैंक में गिरवी रख दिया और उसे 7,000/- रुपये दिए। यहां-वहां से मदद मिलने के बाद जाधव की हेलसिंकी की वारी संभव हो सकी।


पदक जीतने का रोमांचक सफर


हेलसिंकी ओलंपिक भारतीय खिलाड़ियों के लिए चुनौती भरा रहा था। लगभग सभी प्रतिभागियों के मैचेस खत्म हो चुके थे।और ओलंपिक खत्म होने में सिर्फ 2-3 दिन बचे थे। इसलिए हेलसिंकी गए भारतीय खिलाड़ी युरोप के शहरों में घूमना फिरना चाहते थे। दौरे पर गए टीम के मैनेजर प्रताप चंद खिलाड़ियों को लेकर घूमने जाने के लिए उतावले हो गए थे। इस कारण वह खाशाबा जाधव के मैच का दिन भुल गए थे। इसके विपरीत उन्होंने खाशाबा से कहा, 'तुम्हारा मैच कल है, तो आज ही हमारे साथ घूमने चल।


हालाँकि, खाशाबा को ये पता था कि, वह कैसी समस्या का सामना कर के हेलसिंकी आएं हैं। उनका ध्यान सिर्फ और सिर्फ मेडल हासिल करने पर था। इसलिए उसने टहलने जाने से मना कर दिया और यह कहते हुए मैदान की ओर चल दिया कि वह अपने खाली समय में अन्य पहलवानों के मैच देखेगा। और वह अपनी किट लेकर अन्य खिलाड़ियों के मैच देखने चले गए।



मैट में अन्य पहलवानों का मैच शुरू था। और उसे देखने जाधव बैठ गए। हालांकि कुछ समय पश्चात खाशाबा ने अपना नाम सुना। दरअसल, अंग्रेजी समझना मुश्किल था। लेकिन, सौभाग्य से, उन्हें जाधव यह अपना सरनेम पता चला। उन्होंने पूछताछ की तो, उन्हें पता था कि अगला मैच उनका ही है।



उस समय जाधव के साथ भारतीय टीम का कोई अधिकार या सदस्य नहीं था। समय अजीब नहीं था, पर खाशाबा के पास एक ही विकल्प था कि, तैयार हो कर कुश्ती के लिए उतरना। अंत में जाधव मैच के लिए मैट पर उतरे। शुरुआती मैचों में उन्होंने कनाडा, मैक्सिको और जर्मनी के पहलवानों को हराया।



अगला क्वार्टर फाइनल मैच रूस के मेमेदबेव के खिलाफ था। खाशाबा को अंदाजा था कि यह प्रतिद्वंद्वी मजबूत है। उन्होंने मैच की तैयारी भी की थी। लेकिन, असल मैट पर लड़ाई काफी लंबी चली। और खाशाबा 0-3 से हार गए। एक किताब में इस बात का जिक्र किया गया है कि, मैच में अंपायरों के कुछ फैसले खाशाबा के खिलाफ गए थे।



इस मैच के तुरंत बाद खाशाबा को अगला राऊंड खेलना था। वास्तव में देखा जाए तो ओलंपिक खेलों में ये नियम था कि, ओलंपिक के दो मैचों में कम से कम आधे घंटे का ब्रेक होना चाहिए। लेकिन, जब ये सारा ड्रामा चल रहा था, तब खाशाबा वहां अकेले थे, उनका पक्ष लेने वाला कोई टीम मैनेजर नहीं था। इसके अलावा, खाशाबा को ज्यादा अंग्रेजी नहीं आती थी। वे सिर्फ कुश्ती करना जानते थे। इसलिए उन्होंने विरोध नहीं किया। आखिर में वह जापान के शोहोची इशी के साथ खेलने के लिए मैट पर उतरे। हालांकि शरीर इतना थक गया था कि कुछ ही देर में उन्हें 0-3 से हार का सामना करना पड़ा। लेकिन तब तक खाशाबा जाधव ने कांस्य पदक पर अपना नाम लिख दिया था। और ओलंपिक खेलों में भारत की ओर से वैयक्तिक मेडल जीतने वाले पहले खिलाड़ी बन गए। वहीं व्यक्तिगत स्तर पर स्वतंत्र भारत के लिए यह पहला ओलंपिक पदक बन गया।



पदक वितरण के समय भी खाशाबा वाली अकेले ही थे, लेकिन उन्होंने इस अवसर को महत्व दिया। और तिरंगा के साथ गर्व से पदक स्वीकार करने चला गया। घूमने गई भारतीय टीम मेडल वितरण समारोह के बाद वापस लौटी।



गांववालों ने ऐसे किया स्वागत


खाशाबा के ओलंपिक में पदक जीतने की जानकारी मिलते ही गांववालों के खुशी का ठिकाना न रहा। हेलसिंकी से अपने वतन लौटे खाशाबा जाधव का स्वागत गांववालों ने
151 सजे-धजे बैलगाड़ियों, हजारों लोगों, ढोल की थाप, लेज़िम के झंडे, पटाखों से किया। गांव से लेकर महादेव मंदिर क्षेत्र तक पूरी तरह से ढका हुआ था। रेलवे स्टेशन से गांव जाने के लिए पैदल 15 मिनट लगते थे, लेकिन जाधव के स्वागत में बिना किसी रोक-टोक के सात घंटे लग गए। गोलेश्वर, कराड तालुका का एक छोटा सा गाँव है। लेकिन भारत को ओलंपिक पदक दिलाने में मदद करने वाला यह गांव पूरी दुनिया में मशहूर हो गया।


इस ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ने भी स्वर्ण पदक जीता लेकिन खशाब को विशेष रूप से सराहना मिली। कोल्हापुर के सभी प्रशिक्षण अखाड़ों और कॉलेजों ने जाधव की सराहना की। खशाबा ने खुद कोल्हापुर में कुश्ती मैच का आयोजन किया था। उन्होंने खुद इसमें हिस्सा लिया और कई कुश्ती मैच जीते। वह उस कॉलेज के प्रिंसिपल को नहीं भूले, जिसने अपना घर गिरवी रखकर उसकी मदद की थी। और जाधव ने अपने प्राचार्य को घर वापस पाने के लिए पैसे भी दिए।

महाराष्ट्र पुलिस में मिली नौकरी


पुलिस में बेहतरीन काम करते हुए जाधव अपने रिटायरमेंट से 6 महीने पहले असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर बन गए थे. 


1955 में, खाशाबा जाधव एक सब-इंस्पेक्टर के रूप में महाराष्ट्र पुलिस में शामिल हुए। वहां उन्होंने अंतरविभागीय कुश्ती प्रतियोगिताओं में कई मुकाबले जीते। साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर एक स्पोर्ट्स गाइड के रूप में काम करना शुरू किया। और कई खिलाड़ियों को ट्रेनिंग भी दी। जाधव ने 27 साल तक पुलिस विभाग में काम किया। उन्हें पेंशन के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा। और 14 अगस्त 1984 को एक सड़क एक्सीडेंट में जाधव गंभीर रूप से घायल हुए और फिर हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह गए।


अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित


ओलंपिक पदक के 50वें साल और उनकी मृत्यु के 17 साल बाद 2001 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


तो दोस्तों हम आशा करते हैं, ओलंपिक में स्वतंत्र भारत को पहला वैयक्तिक पदक दिलाने वाले के डी जाधव की यह प्रेरणादायक कहानी आपको जरूर मोटीवेट करेगी। खाशाबा जाधव के संघर्ष को लेकर अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर शेयर करें।

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